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स्वामी दयानन्द सरस्वती विद्यालय में शुक्रवार को अपना 10 वां आराधना दिवस मनाया।
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छात्रों ने दिखाइए अपनी प्रतिभाऐं, भव्य तरीके से मनाया गया आराधना दिवस।
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समारोह का शुभारंभ दीप प्रज्वलन एवं पूज्य स्वामी के चित्र पर पुष्पांजलि के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ किया/
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कार्यक्रम में छात्रों ने भजन, गढ़वाली और राजस्थानी लोक नृत्य, स्वागत गीत, नुक्कड़ नाटक, देश भक्ति गीत योग प्रदर्शन तथा नन्हे बच्चों ने जिससे कार्यक्रम में रंगारंग प्रस्तुतियां दी जिसे देख कर लोग थिरकने पर मजबुर हो गए/
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ग्रामीण क्षेत्र में प्रतिभाओं की कोई कमी नही है केवल उन्हें परखने ओर तरासने की आवश्यकता है जो बच्चे खेल कूद व सांस्कृतिक कार्यक्रमो में प्रतिभाग करते है दूसरे बच्चों को भी उनसे प्रेरणा लेनी चाहिये”-स्वामी श्रद्धानन्द
कलियर। स्वामी दयानन्द सरस्वती विद्यालय में शुक्रवार को अपना 10 वां आराधना दिवस मनाया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि स्वामी श्रद्धानन्द व विद्यालय के प्राचार्य गिरीश चन्द्र उनियाल ने मुख्य अतिथि के साथ
समारोह का शुभारंभ दीप प्रज्वलन एवं पूज्य स्वामी के चित्र पर पुष्पांजलि के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ किया । जिसके बाद छात्र छात्राओं ने कार्यक्रम में रंगा रंग प्रस्तुति देकर सभी को मंत्र मुग्ध कर दिया । कार्यक्रम का संचालन मीना नौटियाल एवं चेतना मेहता ने किया।
शुक्रवार को गुम्मावाला माजरी में स्वामी दयानन्द सरस्वती विधालय में आयोजित 10 वे आराधना दिवस के मौके पर आयोजित कार्यक्रम के दौरान गणेश वंदना नृत्य के साथ संस्कृतिक कार्यक्रम की शुरुआत हुई जिसके बाद स्वागत भाषण में प्राचार्य ने पूज्य स्वामीजी के मिशन एवं एम फॉर सेवा फाउंडेशन के कार्यों पर प्रकाश डाला।
रतन रॉय ने स्वामी के जीवनवृत्त और उनके योगदानकर्ता की व्याख्या करते हुए शिक्षा की भूमिका पर जोर दिया। वहीं राजेश नौटियाल ने एम फॉर सेवा के उद्देश्यों एवं प्रबंध न्यासी शीला बालाजी के जीवन से प्रेरणा साझा की।
कार्यक्रम में छात्रों ने भजन, गढ़वाली और राजस्थानी लोक नृत्य, स्वागत गीत, नुक्कड़ नाटक, देश भक्ति गीत योग प्रदर्शन तथा नन्हे बच्चों ने जिससे कार्यक्रम में रंगारंग प्रस्तुतियां दी जिसे देख कर लोग थिरकने पर मजबुर हो गए/
इस दौरान मुख्य अतिथि स्वामी श्रद्धानन्द ने कहा कि “विधालय में समय समय पर इस तरह के कार्यक्रमो का आयोजन होना चाहिये ऐसे आयोजन से बच्चों को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिलता है और ग्रामीण क्षेत्र में प्रतिभाओं की कोई कमी नही है केवल उन्हें परखने ओर तरासने की आवश्यकता है जो बच्चे खेल कूद व सांस्कृतिक कार्यक्रमो में प्रतिभाग करते है दूसरे बच्चों को भी उनसे प्रेरणा लेनी चाहिये”।
आखिर में संयोजक सीमा सत्यूवाली ने भावपूर्ण धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। ओर विधालय के प्रधानाचार्य गरीश चन्द्र उनियाल ने कार्यक्रम में उपस्थित सभी अभिभावकों का आभार व्यक्त किया और विधालय के छात्रो के उज्जवल भविष्य की कामना की है कार्यक्रम का समापन एम फॉर सेवा एंथम एवं राष्ट्रगान के साथ हुआ। इसदौरान विधालय के सभी शिक्षक व स्टाफ उपस्थित रहा ।
विद्यालय के प्राचार्य गिरीश चन्द्र उनियाल
प्रिय विद्यार्थियों,
आज आराधना दिवस के इस पावन अवसर पर मैं आप सभी से एक महत्वपूर्ण विषय पर बात करना चाहता हूँ—अपनी संस्कृति को कैसे बचाया जाए।
हमारी भारतीय संस्कृति विश्व की सबसे प्राचीन और महान संस्कृतियों में से एक है। इसमें आदर, अनुशासन, परिवार के प्रति सम्मान, गुरुजनों के प्रति श्रद्धा, और प्रकृति के साथ सामंजस्य की अद्भुत परंपरा है। लेकिन आधुनिकता की अंधी दौड़ में कई बार हम अपनी जड़ों को भूलने लगते हैं।
संस्कृति को बचाने का पहला और सबसे बड़ा साधन है—ज्ञान और आचरण। जब तक हम स्वयं अपनी भाषा, वेशभूषा, परंपराओं, त्योहारों और रीति-रिवाजों का पालन करेंगे, तभी अगली पीढ़ी भी उनसे जुड़ी रहेगी।
दूसरा उपाय है—गर्व करना। हमें अपनी संस्कृति पर गर्व होना चाहिए, न कि उसे बोझ समझना चाहिए। यदि हम इसे अपनाएँगे तो यह हमारे व्यक्तित्व को और भी ऊँचाई देगी।
तीसरा उपाय है—साझेदारी। अपने घर में, अपने विद्यालय में, समाज में सांस्कृतिक कार्यक्रमों को बढ़ावा दें, लोकगीतों, लोकनृत्यों, शास्त्रीय संगीत और साहित्य को सीखें और दूसरों को भी प्रेरित करें।
और सबसे बड़ा उपाय है—संस्कार। जो मूल्य हमें परिवार और गुरुकुल से मिले हैं—सत्य, अहिंसा, सेवा, ईमानदारी और करुणा—उनका पालन ही हमारी असली पहचान है।
प्रिय बच्चों,
यदि हम सब मिलकर अपनी परंपराओं को जिएँ, उन्हें आगे बढ़ाएँ और नई पीढ़ी तक पहुँचाएँ, तभी हमारी संस्कृति सुरक्षित रह पाएगी। यही हमारी ज़िम्मेदारी है और यही आज आराधना दिवस पर हमारी सच्ची आराधना होगी।
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