महाउत्सव दीपावली: जहाँ आरोग्य, ज्ञान, प्रकृति और स्नेह मिलकर रचते हैं अलौकिक संस्कृति
— शर्मा (सनातन रिसर्चर)
जगत की जननी माता आदिशक्ति ने समस्त संसार के कल्याण, सुख-सुविधा और समृद्धि की वृद्धि के लिए ही समुद्र मंथन के दौरान कार्तिक अमावस्या की इसी पावन रात्रि को महालक्ष्मी के रूप में अवतार लिया था। उनके प्राकट्य के अलौकिक उल्लास में संपूर्ण सृष्टि अनादि काल से दीपावली का यह महापर्व अत्यंत धूमधाम से मनाती आ रही है। केवल एक दिन का उत्सव न होकर, यह पाँच दिवसीय सनातन संस्कृति का जीवंत और प्राचीन प्रतीक है।
पर्व से पूर्व घरों की गहरी साफ-सफाई और रंग-रोगन किया जाता है, जिससे माता लक्ष्मी का आगमन होता है। त्रेतायुग में जब मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम चौदह वर्ष का वनवास पूर्ण कर और असुरों का संहार कर इसी ऐतिहासिक रात्रि को अपनी नगरी अयोध्या लौटे, तो उनके चरण पड़ते ही इस पावन पर्व का उल्लास कई गुना अधिक बढ़ गया। आज भी इस अवसर पर बाजारों में सोने-चांदी के आभूषणों, बर्तनों और सजावट के सामान की जमकर बिक्री होती है। लोग एक दूसरे को उपहार और मिठाइयां देते हैं।
1. धनतेरस: आरोग्य और वैभव का श्रीगणेश
इस महापर्व का आरंभ कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी यानी ‘धनतेरस’ से होता है। समुद्र मंथन के दौरान इसी दिन भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे, इसलिए इसे ‘धन्वंतरि जयंती’ भी कहते हैं। इस दिन आरोग्य और समृद्धि के लिए धन्वंतरि जी, माता लक्ष्मी और कुबेर देवता की पूजा की जाती है। परंपरा के अनुसार नई वस्तुएं, बर्तन, आभूषण और ‘खड़े धनिए’ की खरीदारी की जाती है। साथ ही, अकाल मृत्यु से रक्षा के लिए घर के मुख्य द्वार पर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके आटे का चौमुखी ‘यम दीपक’ जलाया जाता है।
2. नरक चतुर्दशी: सौंदर्य और आरोग्यता का पर्व
कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली) मनाई जाती है। इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण और माता सत्यभामा ने नरकासुर का वध कर समाज को भयमुक्त किया था। इस दिन का मुख्य विधान ‘अभ्यंग स्नान’ है। ब्रह्म मुहूर्त में तिल के तेल की मालिश और औषधीय उबटन से स्नान करने पर अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति मिलती है और आरोग्यता की वृद्धि होती है। संध्या के समय चौखट और नालियों के पास दीपक जलाकर नकारात्मक ऊर्जा को दूर किया जाता है।
3. दीपावली: ज्ञान का प्रकाश और महालक्ष्मी पूजन
कार्तिक अमावस्या की इस पावन रात्रि को महालक्ष्मी, गणेश जी और माता सरस्वती की विधिवत पूजा की जाती है। इस दिन घरों को दीपों, रंगोली और फूलों से सजाया जाता है ताकि माता लक्ष्मी का स्थायी आगमन हो सके। व्यापारी बही-खातों और तिजोरी का पूजन कर नए वित्तीय वर्ष का श्रीगणेश करते हैं। रात के समय घरों के कोने-कोने में पंक्तिबद्ध घी व तेल के दीपक जलाए जाते हैं, जो अज्ञानता के अंधकार पर ज्ञान और सकारात्मकता की विजय का प्रतीक हैं।
4. गोवर्धन पूजा: प्रकृति के प्रति कृतज्ञता
कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा और अन्नकूट मनाया जाता है। द्वापर युग में भगवान कृष्ण ने ब्रजवासियों से गोवर्धन पर्वत की पूजा करवाई थी। इस दिन गाय के गोबर से गोवर्धन की आकृति बनाकर उसकी पूजा और परिक्रमा की जाती है। गौ माता की सेवा कर विभिन्न अनाजों और सब्जियों से ‘अन्नकूट’ तैयार कर भगवान को भोग लगाया जाता है, जो हमें प्रकृति और पशु-धन के संरक्षण का संदेश देता है।
5. भैया दूज: पारिवारिक सौहार्द का पर्व
इस पाँच दिवसीय अनुष्ठान का समापन कार्तिक शुक्ल द्वितीया को ‘भैया दूज’ (यम द्वितीया) के साथ होता है। इसी दिन यमराज अपनी बहन यमुना के घर भोजन करने गए थे। इस दिन बहनें भाइयों को तिलक कर उनकी दीर्घायु की मंगलकामना करती हैं और भाई अपनी सामर्थ्यनुसार उपहार भेंट करते हैं। यह पर्व भाई-बहन के पवित्र स्नेह को प्रगाढ़ करता है।
संक्षेप में कहें तो दीपावली का यह पाँच दिवसीय महाअनुष्ठान केवल बाहरी सजावट या उल्लास का पर्व नहीं है, बल्कि यह समाज के लिए सनातन संस्कृति का एक संपूर्ण जीवन-दर्शन है। यह हमें धनतेरस से आरोग्य, दीपावली से ज्ञान, गोवर्धन पूजा से प्रकृति-प्रेम और भैया दूज से पारिवारिक स्नेह का वह अनमोल पाठ पढ़ाता है, जो हर व्यक्ति और पूरे समाज को ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ (अंधकार से प्रकाश की ओर) की सच्ची राह पर आगे ले जाता है।